दुर्गा पूजा पर निबंध 2021 | Essay on Durga Puja in Hindi

दुर्गा पूजा प्रतिवर्ष हिन्दुओं द्वारा मनाया जाने वाला एक प्रसिद्द त्यौहार है। यह भव्य त्यौहार माता दुर्गा की पूजा-आराधना के साथ मनाया जाता है। यह त्यौहार माँ दुर्गा द्वारा महिषासुर के अंत की ख़ुशी में मनाया जाता है। इस पर्व को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतिक माना जाता है। इस त्यौहार के बिच अन्य त्यौहार दशहरा भी बहुत ही धूम-धाम से मनाया जाता है।

मां दुर्गा शक्ति का प्रतीक है इसलिए सभी उनके आगे नतमस्तक होकर उन्हें प्रणाम करते है। इस त्यौहार का आयोजन दस दिनों तक किया जाता है जिसमें दुर्गा पूजा से लेकर विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम किए जाते है।

सभी लोग इस अवसर पर खुश होते हैं क्योंकि ऑफिस और विद्यालयों में अवकाश रहता है और सभी मिलजुलकर एक साथ इस उत्सव को मना सकते हैं। हम आज इसी विशेष उत्सव दुर्गापूजा के बारे में जानेंगे।

दुर्गा पूजा प्रस्तावना

दुर्गा पूजा का त्यौहार हिंदू धर्म को मानने वाले लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण त्यौहार है इस त्यौहार को नवरात्रि के नाम से भी जाना जाता है। दुर्गा पूजा का त्योहार स्त्री सम्मान को भी दर्शाता है।

इस पर्व को भारतीय लोगों द्वारा बड़े ही उत्साह और प्रेम पूर्वक मनाया जाता है। इस समय सभी घरों और बाजारों में एक अलग ही रौनक देखने को मिलती है।

भारत में त्योहारों का सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक महत्व है। यहां मनाए जाने वाले सभी त्योहार मानवीय गुणों को स्थापित कर लोगों में प्रेम, एकता व सद्भावना को बढ़ाने का संदेश देते हैं। दरअसल, ये त्योहार ही हैं जो परिवारों और समाज को जोड़ते हैं।

दुर्गा पूजा भी भारत का प्रसिद्ध त्यौहार है। इस त्यौहार को दुर्गोत्सव या षष्ठोत्सव भी कहते हैं। हर वर्ष पतझड़ की ऋतु में ये त्यौहार आता है। ये हिन्दुओं का मुख्य त्यौहार है अतः वे इसे धूमधाम और हर्ष उल्लास के साथ मनाते हैं।

दुर्गा पूजा का इतिहास (History of Durga Puja)

  • मां दुर्गा को हिमाचल और मेनका की पुत्री माना जाता है, ऐसा माना जाता है कि भगवान भोलेनाथ की पत्नी “सती” के आत्मदाह के बाद मां दुर्गा के अवतार का जन्म हुआ था।
  • उन्हें सती का दूसरा रूप कहा जाता है। दुर्गा पूजा से जुड़ी कथाओं के अनुसार माता सती ने दुर्गा का अवतार इसलिए दिया था
  • क्योंकि उस समय महिषासुर नामक असुर ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करना प्रारंभ कर दिया और इससे देवलोक और पृथ्वी लोक पर हाहाकार मच गया था।
  • मां दुर्गा महिषासुर नामक राक्षस से दस दिनों तक युद्ध किया और दसवें दिन उसका संहार कर दिया था बहुत भगवान राम ने भी रावण का वध करने से पहले मां दुर्गा की पूजा की थी।

इसी के बाद से मां दुर्गा का त्यौहार मनाया जाने लगा। मां दुर्गा ने महिषासुर से दस दिनों तक युद्ध किया था इसलिए इस त्यौहार का आयोजन नौ दिनों तक मां दुर्गा के अलग-अलग रुपो की पूजा करके दसवें दिन मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन कर दिया जाता है।

दुर्गा पूजा की प्रतिमा (Durga Puja Statue)

दुर्गा पूजा हिंदूओं का विशेष व काफी बड़े स्तर पर मनाया जाने वाला त्योहार है। ये बंगालियों का खास त्योहार है। इसकी तैयारियां करीब एक महीने पहले से ही शुरु कर दी जाती है।जिस प्रकार से गणेश जी की मूर्ति की स्थापना करके दस दिनों के बाद उसे विसर्जित करते हैं, वैसे ही दुर्गा माता के मूर्ति को भी विसर्जित किया जाता है।

दुर्गा पूजा को बहुत नामों से जाना जाता है। दुर्गा माता शक्ति की देवी होती है। दुर्गा माँ मेनका और हिमालय की पुत्री थीं वह सती का अवतार थीं। दुर्गा पूजा को पहली बार तब किया गया था, जब भगवान श्री राम ने रावण पर विजय पाने के लिए दुर्गा माँ से शक्ति पाने के लिए पूजा की थी।

इस दिन लोगों द्वारा दुर्गा देवी की पूरे नौ दिन तक पूजा की जाती है। उत्सव की समाप्ति पर दुर्गा माँ की मूर्ति को नदीयों में अथवा अन्य किसी जल स्त्रोत में ले जाकर विसर्जन किया जाता है।

कई लोग इस त्यौहार पर नौ दिवस का व्रत रखते हैं और कई लोग केवल सिर्फ पहले और अंतिम दिवस व्रत रखते हैं। वे ऐसा मानते है कि इस व्रत से उन्हें माँ दुर्गा जी का आशीर्वाद मिलेगा।

वे ये भी मानते हैं कि दुर्गा मां उनको सारी परेशानियों से दूर रखेंगी और नकारात्मक उर्जा भी उनके पास नहीं आएगी। श्री दुर्गा माँ की स्तुति के लिए सभी ये मंत्र जप करते हैं –

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सवार्थ साधिके, शरंयेत्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते।

दुर्गा पूजा में पंडाल लगाकर दुर्गा मां की मूर्ति रखी जाती है और माता का श्रृंगार करते हैं। इस उपलक्ष्य में विभिन्न पंडालों को देखकर उनमें से जो सबसे अच्छा, रचनात्मक, सजावटी और आकर्षक पंडाल होता है उसे पुरस्कार प्रदान किया जाता है।

इन पंडालों की भव्य छटा कोलकाता में और सारे पश्चिम बंगाल में नवरात्रि के दौरान दिखाई देती है। दुर्गा पूजा के लिए बनाए गए इन पंडालों में दुर्गा मां की मूर्ति महिषासुर को मारते हुए बनवाई जाती है और दूसरे देवी देवताओं की मूर्तियां भी बनवाकर दुर्गा मां के साथ विराजित किया जाता है।

वे त्रिशूल पकड़े होती हैं और उनके चरणों में महिषासुर गिरा होता है। इस पूरी झांकी को वहां चाला कहते हैं। माता के पीछे की तरफ उनके वाहन शेर की मूर्ति होती है। दाईं तरफ सरस्वती और कार्तिकेय व बाईं तरफ लक्ष्मीजी, गणेशजी होते हैं। छाल पर शिवजी की मूर्ति या तस्वीर भी बनी होती है।

इस मौके पर अलग अलग तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, कई प्रकार की प्रतियोगिताओं का आयोजन होता है। सभी लोग इस विशेष उत्सव पर पारंपरिक वेशभूषाएं पहनते हैं। कहा जाता है कि राजा महाराजा तो इस पूजा को बहुत ही बड़े स्तर पर किया करते थे।

दुर्गा पूजा का आयोजन (Organizing Durga Puja)

मां दुर्गा के त्यौहार का आयोजन बड़े ही उत्साह और श्रद्धा के साथ दस दिनों तक किया जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार अश्विन शुक्ला सप्तमी से लेकर दशमी (विजयादशमी) उत्सव का आयोजन किया जाता है।

नौ दिनों तक चलने वाले इस त्योहार को लगभग पूरे भारत में मनाया जाता है इसकी तैयारियां महीनों पहले से ही की जाने लग जाती है। इन दिनों में विद्यालयों और कॉलेजों की छुट्टियां कर दी जाती है जिसके बारे में विद्यार्थी भी खूब धूमधाम से इस उत्सव को मनाते है।

पहले दिन मां दुर्गा की प्रतिमा को विराजमान किया जाता है फिर नौ दिनों तक माता के विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है। संध्या की आरती के बाद विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिताएं की जाती है जैसे डांडिया डांस, भजन नृत्य इत्यादि का आयोजन किया जाता है जिससे यह त्यौहार और भी रोचक हो जाता है।

माता का पूरा पांडाल तरह-तरह की रंग बिरंगी फूलों और लाइटों से सजा दिया जाता है यह देखने में बहुत ही खूबसूरत लगता है।

इस त्यौहार में माता को रिझाने के लिए स्त्रियां और पुरुष नौ दिनों तक व्रत रखते है। दुर्गा पूजा का यह त्यौहार विशेष रूप से गुजरात, बंगाल, ओडिशा, असम, बिहार में मनाया जाता है लेकिन वर्तमान में यह सभी जगह पर प्रमुख रूप से मनाया जाता है।

नवरात्र के अंतिम तीन दिनों में यह त्यौहार अपने चरम पर होता है सप्तमी अष्टमी और नवमी को माता की विशेष पूजा की जाती है और कुछ स्थानों पर तो बड़े-बड़े मेलों का भी आयोजन किया जाता है।

उत्तरी भारत में नवमी के दिन मां दुर्गा की पूजा करने के बाद कन्याओं को भोजन करवाया जाता है वहां के लोगों का मानना है कि इस दिन मां दुर्गा स्वयं कन्या के रूप में उनके घर आती है और भोजन करती है।

बंगाल में तो इस त्यौहार को इतनी प्रमुखता से मनाया जाता है कि इस के उपलक्ष पर विवाहित पुत्रियों को माता-पिता द्वारा घर बुलाने की प्रथा है।

दुर्गा पूजा की कथाएं (Stories of Durga Puja)

नवरात्रियों में देवी दुर्गा की पूजा इसलिए की जाती है, क्योंकि यह माना जाता है कि देवी दुर्गा ने 10 दिन और रात तक युद्ध करने के बाद महिषासुर नाम के राक्षस को मारा था। दुर्गा पूजा को असत्य पर सत्य की विजय के लिए मनाया जाता है।

जब दुर्गा पूजा का आयोजन होता है तब उत्तरी भारत में नवरात्र मनाये जाते हैं और दसवें दिन विजयदशमी यानी दशहरा मनाया जाता है। उत्तर भारत में इस समय रामलीला की जाती है। दुर्गा पूजा की सबसे प्रचलित कथा इस प्रकार से है।

बहुत समय पहले देवता और असुर स्वर्ग पाने के लिए लड़ते रहते थे। देवता हर बार असुरों को किसी ना किसी तरीके से पराजित कर देते थे। एक दिन एक राक्षस जिसका नाम महिषासुर था उसने ब्रह्मा जी को तपस्या करके उन्हें प्रसन्न कर लिया। तब उसने ब्रह्मा जी से अमर होने का वरदान देने को कहा।

परन्तु ब्रह्मा जी ने उसे ये वरदान नहीं दिया और कहा कि वे अमरता का वरदान नहीं दे सकते, लेकिन ये वर देता हूं कि तुम्हे कोई पुरुष नहीं मार सकता केवल स्त्री ही मार सकती है।

अब महिषासुर इस वरदान से बहुत प्रसन्न हुआ उसने सोचा कि मैं इतना ताकतवर हूं मुझे कोई स्त्री क्या हरा पाएगी। इसके बाद सारे असुरों ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया, वे महिषासुर को नहीं मार सकते थे अतः अपनी व्यथा लेकर त्रिदेवों के पास गए।

ब्रह्मा विष्णु और महेश तीनों ने मिलकर अपनी शक्तियों से शक्ति की देवी दुर्गा को जन्म दिया और उनसे महिषासुर का वध करने को कहा।

मां दुर्गा और महिषासुर में युद्ध हुआ और आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मां दुर्गा ने इस पापी महिषासुर का वध कर दिया। उसी दिन से इस दिन को बुराई पर अच्छाई की विजय का त्यौहार और शक्ति की पूजा के उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

दुर्गा पूजा का महत्व (Importance of Durga Puja)

त्योहार जीवन में विश्रंखलता को दूर कर एकसूत्रता स्थापित करते हुए मंगल भावना का प्रसार करते है। यह माना जाता है कि, दुर्गा मां की पूजा करने से समृद्धि, आनंद, अंधकार का नाश और बुरी शक्तियां दूर होती है।

ये हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण त्योहार है जिसका धार्मिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सांसारिक महत्व है। लोग जो विदेशों में रहते हैं खासकर दुर्गा पूजा के लिए छुट्टियाँ लेकर आते हैं। दुर्गा पूजा के लिए स्कूलों, कॉलेजों और सरकारी दफ्तरों में 10 दिनों का अवकाश भी होता है।

दुर्गा पूजा के दौरान कई कार्यक्रम भी आयोजित किये जाते हैं। ये त्यौहार हमारे देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में मनाया जाता है। नवरात्र में डांडिया और गरबा नृत्य करना शुभ मानते है। बहुत से स्थानों पर सिन्दूरखेलन की प्रथा भी है।

जिसमें विवाहित महिलाएं पूजा स्थल पर से खेलती है। गरबा की प्रतियोगिताएं रखी जाती है और विजेता को ईनाम दिए जाते हैं।

दुर्गा पूजा की विधि (Method of Durga Puja)

दुर्गा पूजा का उत्सव अश्विन शुक्ल षष्ठी से लेकर दशमी तिथि तक मनाया जाता है। इस त्यौहार पर मां दुर्गा की नौ दिन तक पूजा की जाती है। इस दिन लोग इच्छानुसार पूरे नौ दिनों तक या फिर सिर्फ पहले या अंतिम दिन व्रत रखते हैं। दसवें दिन विजयदशमी मनाई जाती है।

इस दिन मां दुर्गा जी की मूर्ति को सजाकर पूजा की जाती है और प्रसाद बांटा जाता है। लोग अपनी पसंद के अनुसार वस्तुएं अर्पित करके पूजा करते हैं। दुर्गा मां की पूजा करने से आनन्द और समृद्धि मिलती है, अंधकार तथा बुरी शक्तियों का विनाश होता है।

इस दिन पूरी रात पूजा, स्तुति, अखण्ड पाठ और जप तप चलता है। देवी मां की मूर्तियों को श्रृंगारित करके हर्षोल्लास पूर्वक भक्तजन उनकी झांकी निकालते हैं। अंत में दुर्गा मां की ये मूर्तियां स्वच्छ जलाशय, नदी अथवा तालाब में विसर्जित कर दी जाती हैं।

चूंकि दशहरे का त्यौहार राम और रावण युद्ध से जुड़ा है इसलिए इसे दिखाने के लिए रामलीला का आयोजन होता है। इन दिनों बाजारों में खूब भीड़ रहती है। कई स्थानों पर मेले लगते हैं। गरबा और डांडिया रास की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं।

किसान इस विशेष त्यौहार के समय खरीफ की फसल काटते हैं। विजयादशमी पर शस्त्रागारों से शस्त्र निकालकर उनका शास्त्रीय विधि से पूजन भी किया जाता है। कोलकाता में संपूर्ण पूजा के दौरान देवी दुर्गा की पूजा विभिन्न रूपों में की जाती है।

इन रूपों में सबसे प्रसिद्ध रूप है कुमारी। इस उत्सव में दुर्गा देवी के सामने कुमारी की पूजा की जाती है, क्योंकि उन्हें शुद्ध और पवित्र रूप मानते है। देवी के इस रूप की पूजा करने के लिए 1 से 16 वर्ष की कुआंरी बालिकाओं का चयन किया जाता है और उनकी पूजा होती है।

प्रतिमा विसर्जन (Image Immersion)

नवमी की रात मां दुर्गा के पंडाल में विशाल भजन संध्या का आयोजन किया जाता है जिसमें सभी लोग भक्ति और श्रद्धा भाव से हिस्सा लेते हैं और रात भर मां दुर्गा के भजन गाते है।

दशमी के दिन मां दुर्गा की पूजा करने के बाद दुर्गा मां की मूर्तियों को रंग बिरंगे फूलों से सजा कर पूरे शहर और गांव भर में झांकियां निकाली जाती है। झांकियों में लोग खूब नाचते गाते है, गुलाल रंग उड़ाते है, ढोल नगाड़े बजाते हैं सभी इस त्यौहार में शामिल होकर आनंद उठाते है।

बाद में मां दुर्गा की प्रतिमा को पवित्र जलाशयों, तालाब या नदियों में विसर्जित कर दिया जाता है। विसर्जन के समय लाखों की संख्या में लोग हिस्सा लेते है। यह इस त्यौहार का अंतिम क्षण होता है जब सभी लोग भावुक हो जाते है।

मां के विसर्जन के समय सभी लोग उनका आशीर्वाद देते हैं और सुख समृद्धि और खुशियों की कामना करते हैं इसके बाद सभी लोग अपने अपने घर लौट जाते है।

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उपसंहार

हमें पूर्ण निष्ठा और पवित्र भावना रखकर इस त्यौहार को मनाना चाहिए। धार्मिक दृष्टि से देखा जाए तो विजयादशमी का त्यौहार आत्मशुद्धि का त्यौहार है। दुर्गा पूजा के दिन शक्ति पाने की कामना की जाती है ताकि बुरी शक्तियों और नकरात्मकता का नाश हो जाए।

जैसे भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश की शक्तियों से मिलकर सर्वशक्तिमान माँ दुर्गा बनी और उन्होंने बुराई का अंत किया, उसी तरह हमें भी अपनी बुराईयां खोजकर उनका अंत करना चाहिए और मानवता की रक्षा करनी चाहिए।

दुर्गपूजा एक ऐसा त्योहार है, जिससे हमारे जीवन में उत्साह और ऊर्जा का संचार होता है। मां दुर्गा की प्रसन्नता के लिए कभी भी उनकी पूजा स्तुति की जा सकती है, पर नवरात्रि में इस पूजा की विशेष महत्ता है।

भारत में प्रत्येक त्योहार बड़े ही धूमधाम और उत्साह पूर्वक मनाया जाता है। इन त्योहारों से भारतीय लोगों में परस्पर भाईचारे और प्रेम भाव का विस्तार होता है।

साथ ही हमें इन त्योहारों से आदर्श, सत्यता और नैतिकता की शिक्षा भी मिलती है। यह त्यौहार बुराई पर अच्छाई की विजय का भी प्रतीक है।

मां दुर्गा के इस त्यौहार को स्त्री सम्मान और शक्ति के रूप में भी देखा जाता है। शक्ति पूजा से लोगों में साहस का संचार होता है और भी बुराई के खिलाफ लड़ते है और विजय पाते है।

हिन्दू धर्म में जो भी त्यौहार मनाए जाते हैं उनके पीछे कोई सामाजिक कारण होता है। दुर्गापूजा भी अन्याय, अत्याचार तथा आसुरी शक्तियों के विनाश के लिए मनाते हैं।

जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते।।

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